चालाक बुढ़िया की कहानी | Chalak Budhiya Hindi Kahani | Moral Stories

चालाक बुढ़िया की कहानी, (Chalak Budhiya Hindi Kahani) बहुत ही मनोरंजक और सीख भरी है। जिसे पढ़ने के बाद आपको बहुत अच्छा लगेगा। इस Moral Stories in Hindi में एक बुढ़िया अपनी सूझ-बूझ और चालाकी से शेर, भेड़िया व मगरमच्छ जैसे खूंखार जंगली जानवरों चकमा देकर जंगल के रास्ते होकर अपने बेटी के यहाँ घूमने जाती है। और फिर जब वापस उसी जंगल से लौटती है तो उसके साथ क्या होता है आगे जरूर पढ़िए… चालाक बुढ़िया की पूरी कहानी

चालाक बुढ़िया की कहानी – Chalak Budhiya Hindi Kahani with Moral

चालाक बुढ़िया की कहानी (Chalak budhiya ki kahani)
चालाक बुढ़िया की कहानी (Chalak budhiya ki kahani)

एक बार की बात है, एक थी बुढ़िया। वह एक जंगल के किनारे पर एक छोटे से घर में अकेली रहती थी।

एक दिन की बात है… उसे अचानक ही अपनी बेटी की याद सताने लगी। इसलिए उसके मन में विचार आया कि एक बार जाकर अपनी बेटी से मिल आऊँ।

उसकी बेटी के घर का रास्ता जंगल से होकर गुजरता था। लेकिन उस बुढ़िया को इस बात की जरा भी फिक्र नहीं थी। वह जंगल के किसी भी जानवर से नहीं डरती थी।

इसलिए वह अपनी बेटी से मिलने के लिए चल पड़ी। लेकिन वह अभी कुछ ही दूर पहुंची थी कि उसे रास्ते में एक शेर मिला। इतना बड़ा शेर उसने पहले कभी नहीं देखा था। मगर बुढ़िया को शेर से जरा भी डर नहीं लग रहा था। वह सीधी चलती जा रही थी।

लेकिन बुढ़िया ने कहा- ‘अभी स्वाद न दे पाऊंगी,
लड़की के घर जाऊंगी, अच्छा खाना खाऊंगी,
मोटी होकर आऊंगी-तब मुझे तुम खा लेना।’

शेर ने बुढ़िया की बात सुनकर सोचा कि यह ठीक कह रही है। इसलिए इस समय बुढ़िया को जाने दो।

जब बुढ़िया वहां से थोड़ी दूर आगे बढ़ गई तो उसे रास्ते में एक भेड़िया दिखाई पड़ा।

‘तुमसे मिलकर बड़ी खुशी हुई बुढ़िया।’ भेड़िये ने कहा- ‘आओ, मैं तुम्हें खा लेता हूं।’

लेकिन बुढ़िया ने कहा-

लेकिन बुढ़िया ने कहा- ‘अभी स्वाद न दे पाऊंगी,
लड़की के घर जाऊंगी, अच्छा खाना खाऊंगी,
मोटी होकर आऊंगी-तब मुझे तुम खा लेना।’

भेड़िये ने बुढ़िया की बात सुनी तो वह सोचने लगा कि यह बुढ़िया ठीक कह रही है, इसलिए इसे जाने देना चाहिए।

बुढ़िया कुछ दूर आगे चली ही थी कि रास्ते में एक मगरमच्छ मिल गया। ‘तुम्हें देखकर कितनी खुशी हो रही है बुढ़िया।’ मगरमच्छ ने कहा- ‘आओ मैं तुम्हें खा लूं।’

लेकिन बुढ़िया ने कहा- ‘अभी स्वाद न दे पाऊंगी,
लड़की के घर जाऊंगी, अच्छा खाना खाऊंगी,
मोटी होकर आऊंगी-तब मुझे तुम खा लेना।’

मगरमच्छ ने सोचा कि ये बुढ़िया बिल्कुल ठीक कह रही है, इसलिए इसे जाने देना चाहिए।

इस प्रकार उन तीनों से बचकर बुढ़िया अपनी बेटी के घर जा पहुंची। बेटी ने जब मां को देखा तो बड़ी खुश, हुई और कहने लगीं- ‘मां, तुमने बहुत अच्छा किया जो आ गईं।’

बुढ़िया बोली- ‘बेटी, मुझे भी तेरी बड़ी याद आ रही थी। इसलिए जंगली रास्ते की भी परवाह न करते हुए, मैं तुझे देखने चली आई।’

इसी प्रकार बुढ़िया को वहां रहते हुए कुछ दिन बीत गये तो बुढ़िया को अपने घर का ख्याल आया। उसने अपनी बेटी को बुलाकर उससे कहा- ‘बेटी! अब मैं वापस जाना चाहती हूं। मुझे कहीं से तू एक लाल रंग का बड़ा-सा मटका मंगवा दे।’

उसकी बेटी ने उसके कहने पर एक बड़ा-सा मटका बुढ़िया को मंगाकर दे दिया। बुढ़िया उस मटके के अन्दर दुबककर बैठ गई ताकि किसी जानवर की नजर उस पर न पड़े।

फिर उसने अपनी बेटी से कहा- ‘बेटी! तुम इस मटके को एक लात मारकर धकेल दो।’

मां की बात सुनकर बेटी ने मटके को एक जोर का धक्का मारा। धक्का मारते ही मटका तेजी से लुढ़कना शुरु हो गया और लुढ़कते हुए जंगल के रास्ते में जा पहुंचा। बुढ़िया बेफिक्री से उस मटके के अन्दर छिपी बैठी थी।

मगर जंगल के अन्दर मगरमच्छ बैठा हुआ बुढ़िया की राह देख रहा था। अचानक मगरमच्छ की नजर उस लुढ़कते हुए मटके के ऊपर पड़ी जो उसकी ओर आ रहा था।

उसने मटके को देखकर कहा- ‘अरे ओ मटके ! क्या तूने रास्ते में किसी बुढ़िया को देखा है ?’

बुढ़िया ने अन्दर से जवाब दिया

‘चल मेरे मटके टिम्बकटू,
कहां की बुढ़िया कहां का तू!’

 इतनी बात सुनकर मगरमच्छ हैरान रह गया, उसे मटके के बोलने पर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। उसने कभी भी किसी मटके को इस प्रकार बोलते हुए नहीं सुना था। इसलिए वह डर गया और मटके के रास्ते से एक तरफ हटकर खड़ा हो गया।

बुढ़िया अपनी चालाकी पर मन-ही-मन खुश हो रही थी। वह सोच रही थी कि मगरमच्छ को उसने किस तरह बेवकूफ बना दिया और वहां से निकलकर आगे आ गई।

मटका उसी तरह लुढ़कता हुआ आगे बढ़ रहा था और इसी प्रकार लुढ़कता हुआ भेड़िये के मार्ग पर जा पहुंचा भेड़िये ने मटके को बड़े गौर से देखते हुए पूछा-

‘अरे ओ मटके! तू यहां किधर से आ रहा है? क्या तूने रास्ते में किसी बुढ़िया को देखा है बुढ़िया ने मटके के अन्दर से ही जवाब दिया-

‘चल मेरे मटके टिम्बकटू,
कहां की बुढ़िया कहां का तू!’

मटके में से इस तरह आवाज आती देखकर भेड़िया हैरान रह गया। उसने कभी इस तरह बोलने वाला मटका नहीं देखा था। इसलिए वह उसके बोलने पर आश्चर्यचकित हो गया था और रास्ते से एक तरफ हटकर खड़ा हो गया था।

बुढ़िया अपनी चालाकी पर फिर से मन-ही-मन खुश हो रही थी कि उसने अपनी चतुरता के कारण भेड़िये को भी चकमा दे दिया और उसके पंजे से बिल्कुल साफ निकल गई थी। अब उसे शेर की परवाह नहीं थी।

मटका लुढ़कता हुआ उसी तरह आगे बढ़ रहा था। अब बुढ़िया आराम से बैठी हल्की-हल्की नींद में सो रही थी। इसलिए उसकी आंख भी लगने लगी भी

अब मटका लगभग जंगल के किनारे पर जा पहुंचा था। मगर शेर वहां बैठकर बड़ी बेसब्री से बुढ़िया का इंतजार कर रहा था कि अब बुढ़िया आए और वह उसे खाकर अपनी भूख को शान्त करे और उसके मांस का स्वाद ले।

अचानक शेर की नजर सामने से लुढ़कते हुए आ रहे मटके पर पड़ी। वह उस मटके को गौर से देखने लगा। फिर गरजकर बोला- ‘अरे ओ मटके! क्या तूने रास्ते में किसी बुढ़िया को देखा है।’

शेर की दहाड़ सुनते ही बुढ़िया की आंख खुल गई। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने अपने आप पर काबू पाते हुए सहमे हुए स्वर में जवाब दिया-

चल मेरे मटके टिम्बकटू,
कहां की बुढ़िया कहां का
तू!’

 शेर ने बुढ़िया की आवाज को अच्छी तरह से पहचान लिया, उसने अपने पंजे से मटके पर जोरदार वार किया। एक पल में ही मटके के दो टुकड़े हो गए। बुढ़िया मटके से बाहर निकल आई तो शेर ने दहाड़कर कहा-

‘आह! अब मैं तुम्हें आसानी से खा सकता हूं।’ लेकिन बुढ़िया पलक झपकते ही नीचे की तरफ झुक गई। उसने जमीन से मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और शेर की आंखों में झोंक दी। शेर जोर-जोर से चिल्लाने लगा- ‘मुझे तो कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है….।’

इतना सुनते ही बुढ़िया जल्दी से वहां से भाग ली, और दौड़ते हुए वह जल्दी ही जंगल से बाहर निकल गई। वह हिफाजत के साथ अपने घर पहुंच गई। उसने कहा-

‘मैंने सबको खूब ललचाया,
पर कोई भी मुझको खा न पाया,
माना कि मैं बुढ़िया हूं,
पर अक्ल में बढ़िया हूं।’

Moral of Story (कहानी से क्या सीख मिली)

प्यारे बच्चो! इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि खतरे के समय हर इंसान को अपनी बुद्धि से काम लेना चाहिए। बुद्धि को इस्तेमाल करने से हर व्यक्ति बड़े-से-बड़े खतरे का सामना कर सकता है।

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